भूमिका (Introduction)
पुस्तकालय विज्ञान (Library Science) के क्षेत्र में यदि किसी एक व्यक्ति का नाम सबसे अधिक सम्मान के साथ लिया जाता है, तो वह हैं – डॉ. शियाली रामामृतम रंगनाथन (Dr. S. R. Ranganathan)। इन्हें आधुनिक पुस्तकालय विज्ञान का जनक (Father of Library Science in India) कहा जाता है।
डॉ. रंगनाथन ने पुस्तकालयों को केवल पुस्तकों का भंडार नहीं, बल्कि ज्ञान का जीवंत केंद्र माना। उन्होंने 1931 में पाँच मूलभूत सिद्धांत प्रतिपादित किए, जिन्हें आज हम पाँच पुस्तकालय सिद्धांत (Five Laws of Library Science) के नाम से जानते हैं।
ये सिद्धांत न केवल भारत में बल्कि पूरी दुनिया में पुस्तकालय संचालन, प्रबंधन, पाठक सेवा और सूचना विज्ञान की नींव बने। आज भी BLISc, MLISc, UGC NET, KVS, NVS, Railway Library Exam जैसी सभी प्रतियोगी परीक्षाओं में ये सिद्धांत अत्यंत महत्वपूर्ण माने जाते हैं।
इस विस्तृत ब्लॉग में हम जानेंगे –
- डॉ. एस. आर. रंगनाथन का परिचय
- पाँचों पुस्तकालय सिद्धांतों का अर्थ
- प्रत्येक सिद्धांत के उदाहरण
- आधुनिक समय में इनका महत्व
- परीक्षा उपयोग और FAQ
डॉ. एस. आर. रंगनाथन का संक्षिप्त परिचय
डॉ. शियाली रामामृतम रंगनाथन का जन्म 12 अगस्त 1892 को तमिलनाडु के शियाली (अब मयिलादुथुराई) में हुआ था। वे गणित के प्राध्यापक थे, लेकिन बाद में पुस्तकालय विज्ञान की ओर उनका रुझान बढ़ा।
उन्होंने भारत में आधुनिक पुस्तकालय प्रणाली की नींव रखी और कोलन वर्गीकरण (Colon Classification) जैसी महत्वपूर्ण पद्धति विकसित की।
उनकी सबसे बड़ी देन – पाँच पुस्तकालय सिद्धांत, जो पुस्तकालय सेवा के नैतिक और व्यावहारिक आधार हैं।
पाँच पुस्तकालय सिद्धांत क्या हैं?
डॉ. रंगनाथन द्वारा प्रतिपादित पाँच सिद्धांत इस प्रकार हैं –
- पुस्तकें उपयोग के लिए हैं (Books are for use)
- प्रत्येक पाठक की अपनी पुस्तक (Every reader his/her book)
- प्रत्येक पुस्तक का अपना पाठक (Every book its reader)
- पाठक का समय बचाओ (Save the time of the reader)
- पुस्तकालय एक बढ़ता हुआ जीव है (Library is a growing organism)
अब हम इन पाँचों सिद्धांतों को विस्तार से समझते हैं।
प्रथम सिद्धांत – पुस्तकें उपयोग के लिए हैं (Books are for use)
अर्थ
इस सिद्धांत का मुख्य भाव यह है कि पुस्तकें अलमारियों में बंद रखने के लिए नहीं हैं, बल्कि पाठकों द्वारा पढ़ने और उपयोग करने के लिए हैं।
पुराने समय में कई पुस्तकालयों में दुर्लभ पुस्तकों को ताले में बंद रखा जाता था, जिससे पाठकों को उनका लाभ नहीं मिल पाता था। रंगनाथन ने इसका विरोध किया और कहा कि पुस्तकालय का उद्देश्य ज्ञान को फैलाना है, न कि उसे छिपाना।
उदाहरण
- पुस्तकालय के खुलने का समय सुविधाजनक होना चाहिए।
- पुस्तकों की खुली अलमारी व्यवस्था (Open Access System) होनी चाहिए।
- पाठकों को पुस्तकों को छूने, देखने और चुनने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए।
महत्व
यह सिद्धांत पुस्तकालय सेवा की आत्मा है। इससे पुस्तकालय अधिक उपयोगी, जीवंत और पाठक-केंद्रित बनता है।
द्वितीय सिद्धांत – प्रत्येक पाठक की अपनी पुस्तक (Every reader his/her book)
अर्थ
इस सिद्धांत का मतलब है कि हर पाठक की आवश्यकता, रुचि और स्तर के अनुसार उसे उपयुक्त पुस्तक मिलनी चाहिए।
पुस्तकालय केवल विद्वानों के लिए नहीं, बल्कि बच्चों, विद्यार्थियों, शोधकर्ताओं, सामान्य नागरिकों – सभी के लिए होना चाहिए।
उदाहरण
- बच्चों के लिए बाल साहित्य
- प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए गाइड और प्रश्न बैंक
- किसानों के लिए कृषि पुस्तकें
- महिलाओं के लिए विशेष संग्रह
महत्व
यह सिद्धांत पुस्तकालय को लोकतांत्रिक बनाता है, जहाँ हर वर्ग के लिए समान अवसर उपलब्ध होता है।
तृतीय सिद्धांत – प्रत्येक पुस्तक का अपना पाठक (Every book its reader)
अर्थ
हर पुस्तक किसी न किसी पाठक के लिए लिखी गई होती है। पुस्तकालय का काम है उस पुस्तक को उसके सही पाठक तक पहुँचाना।
कोई भी पुस्तक बेकार नहीं होती – बस उसके पाठक को ढूँढना होता है।
उदाहरण
- वर्गीकरण और सूचीकरण (Classification & Cataloguing)
- विषय अनुसार पुस्तक व्यवस्था
- प्रदर्शन स्टैंड और नई पुस्तकों का प्रचार
महत्व
यह सिद्धांत पुस्तकों के सही उपयोग और संग्रह के अधिकतम लाभ को सुनिश्चित करता है।
चतुर्थ सिद्धांत – पाठक का समय बचाओ (Save the time of the reader)
अर्थ
पाठक जब पुस्तकालय आता है, तो उसे कम से कम समय में अपनी आवश्यक जानकारी मिल जानी चाहिए।
पुस्तकालय की व्यवस्था इतनी सुव्यवस्थित हो कि पाठक भ्रमित न हो।
उदाहरण
- सुव्यवस्थित वर्गीकरण प्रणाली
- स्पष्ट साइन बोर्ड और मार्गदर्शन
- कंप्यूटर आधारित OPAC
- प्रशिक्षित पुस्तकालय कर्मी
महत्व
यह सिद्धांत आधुनिक डिजिटल लाइब्रेरी, सर्च इंजन और सूचना प्रौद्योगिकी की नींव है।
पंचम सिद्धांत – पुस्तकालय एक बढ़ता हुआ जीव है (Library is a growing organism)
अर्थ
पुस्तकालय स्थिर संस्था नहीं है, बल्कि समय के साथ निरंतर विकसित होने वाला जीव है।
नई पुस्तकें, नई तकनीक, नए पाठक और नई सेवाएँ – यह सब पुस्तकालय के विकास का हिस्सा हैं।
उदाहरण
- डिजिटल लाइब्रेरी का विकास
- ई-बुक और ई-जर्नल संग्रह
- नई शाखाओं का निर्माण
- कर्मचारियों का प्रशिक्षण
महत्व
यह सिद्धांत पुस्तकालय को भविष्य के लिए तैयार करता है और परिवर्तन को अपनाने की प्रेरणा देता है।
आधुनिक युग में पाँच सिद्धांतों की प्रासंगिकता
आज का युग डिजिटल युग है, फिर भी रंगनाथन के सिद्धांत उतने ही प्रासंगिक हैं –
- ई-बुक भी उपयोग के लिए हैं
- हर यूज़र को उसकी जानकारी मिलनी चाहिए
- हर डिजिटल डॉक्यूमेंट का अपना यूज़र है
- सर्च इंजन पाठक का समय बचाते हैं
- डिजिटल लाइब्रेरी भी एक बढ़ता हुआ जीव है
परीक्षा की दृष्टि से महत्व
पाँच पुस्तकालय सिद्धांत निम्न परीक्षाओं में अत्यंत महत्वपूर्ण हैं –
- BLISc / MLISc
- UGC NET (Library & Information Science)
- KVS / NVS Librarian Exam
- Railway Librarian Exam
- DSSSB Librarian
अक्सर प्रश्न पूछे जाते हैं –
- सिद्धांतों के नाम लिखिए
- किस वर्ष प्रतिपादित हुए
- उदाहरण सहित व्याख्या कीजिए
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
प्रश्न 1: डॉ. रंगनाथन ने पाँच सिद्धांत कब दिए?
उत्तर: वर्ष 1931 में।
प्रश्न 2: पाँच सिद्धांत किस पुस्तक में प्रकाशित हुए?
उत्तर: “Five Laws of Library Science” पुस्तक में।
प्रश्न 3: सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत कौन सा है?
उत्तर: सभी समान रूप से महत्वपूर्ण हैं, पर “पुस्तकें उपयोग के लिए हैं” को आधारभूत माना जाता है।
निष्कर्ष (Conclusion)
डॉ. एस. आर. रंगनाथन के पाँच पुस्तकालय सिद्धांत केवल नियम नहीं, बल्कि पुस्तकालय सेवा का दर्शन हैं। इन्होंने पुस्तकालय को जीवंत, मानव-केंद्रित और ज्ञान-विस्तार का माध्यम बनाया।
आज भी हर पुस्तकालयाध्यक्ष, विद्यार्थी और सूचना विशेषज्ञ के लिए ये सिद्धांत मार्गदर्शक प्रकाश स्तंभ हैं।
यदि आप Library Science के विद्यार्थी हैं, तो इन सिद्धांतों को गहराई से समझना आपकी सफलता की कुंजी है।
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